मंजिल का कुछ अता पता नही
फिर भी
चल पड़ा हूँ ....राह में
छोप कर अपने जीवन की डोर उस
मालिक के हाथ मे
चल पड़ा हुँ ....राह में
कब , कैसे औऱ किस वक़्त क्या होगा
कुछ पता नही
फिर भी
चल पड़ा हु.....राह में
कहानियां,कविताओं एवं शायरियों का संग्रह है यहाँ, मेरे जीवन के अनुभवों का वर्णन है यहां ।।
लोकतंत्र को खतरा इन अनपढ़,गवार, सत्ता के भोग विलास में डूबे नेताओ से है, ये खुद नियम ,कानून बनाते है और खुद तोड़ देते है, CORONA की सख्ती से...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें