ख़ौफ था उसे हर बात का ,अपने पर बीते हर जख्म का
वो रहती थी सहमी सी कुछ दुनिया से कुछ अपने आप से ,मग़र उसमें कुछ खास बात थी
आँखों मे ख़ौफ था मगर अंगार से बरस रहे हो
कुछ निगाहे ऐसी थी
अपनी खामोशी से ही हर किसी से बात करती थी
आईना मित्र था उसका,सारी गपशप वो आईने से ही करती थी
खुद का छाया देख लेती तो डर कर छाए को पीट लेती थी
आँखों मे ख़ौफ था मगर दिखते अंगार थे ,कोई देखे तो डर जाए उसी डरी सहमी लड़की से जैसे भद्रकाली को लगी लहू की प्यास हो कुछ ऐसे अंगार थे,
जैसे हर सीधे रास्ते पर कभी मोड़ आता ही है ठीक वैसे आया एक मोड़ उसकी जिंदगी में भी
एक रोज वो अपने मित्र आईने से गपशप कर रही थी कि कुछ वैश्यई दरिंदो उसकी ओर बढ़ गए
वो डरी ,सहमी से भागने लगी कि उसको दबोच
उसके जिस्म को बेपर्दा किया जा रहा था
वो चिल्लाई ऐसे जैसे उसकी आवाज आसमा को चीर देगी,वो तड़पी ऐसे जैसे अभी प्राण त्याग देगी
वो दरिंदे उसके वस्त्र उतार रहे थे,उसका चीरहरण कर ही रहे थे कि
उसने आँखे बंद कर ली और आंखों में अंगार लिए
माँ भद्रकाली का रूप लिया
अपने नाखूनों से पहले एक दरिंदे के गले को चीर दिया
उसे देख लग रहा था जैसे स्वंयम माँ काली उसमें समा गयी
वो डरी सहमी सी लड़की माँ काली बन दरिंदो का वध करने को आतुर हो गयी
उसके रौद्र रुप को देख वो दरिंदे ख़बरा गए ,अपने प्राणों के रक्षार्थ वो भाग खड़े हुए
फिर भी.....एक-दो जो उसके हाथ लगे उनका वध कर लहू से अपने हाथ धोए
हर डरी सहमी लड़की में एक माँ भद्रकाली का रुप होता है ये बात सबको सीखा गयी ।।