सबसे दूर-दूर ही रहता हूं
क्योकि किसी ने कहाँ था "तू तो दोस्ती के लायक भी नही "
हाँ अब चुपचाप सा ही कोने में बैठा रहता हूं ,देखकर भी उसको अब नजरअंदाज करता हु
क्योकि किसी ने कहाँ था " मुझे तेरे मुँह भी नही लगना"
हाँ अब सबसे दूर कहि एकेले में चला जाता हूं
बिन रास्तो और बिन मंजिल के ही
खुद को अंधेरे से भरे कमरे में कैद कर खुद को ही सताता हुँ मै अब
क्योकि किसी ने कहाँ था "भाड़ में जा तू"
हाँ अब किसी को कोई सफाई , कोई समझाईश नही करता मै अब
कोई कह दे तूने गलती की तो हाँ चुपचाप बिन गलत होकर भी खुद को गलत बता माफी मांग चुप हो जाता हूं मैं अब
क्योकि किसी ने कहा था " बोला ना मैंने मुझे कोई फर्क नही पड़ता तेरी इन सब बातों से तुझे समझ नही आता क्या "
अब मै किसी एक ही बात को बार बार दोहरा खुद को सही साबित नही करता मै
ना ही मेरी सच्चाई को उजागर करता हूँ , मै अब चुप्पी ही साधे रहता हूं
क्योकि किसी ने कहा था " क्यो एक ही बात बार बार बके जा रहा है "
हाँ बहुत तकलीफे हुई किसी ने जब ये सब बोला था , आंखे भी नम हो गयी थी
मग़र मुझमे बैठा मेरा स्वाभिमान ही था एक वो जिसने मेरी नम आंखों को पोछ ,
महोब्बत में खुद को गिरा देने के बावजूद मुझको उठा मुझे
नऐ सवेरे की नई सूरज की किरण सा बना
मुझे नई शरुआत को पंख लगा दिए ।
हाँ लेकिन अब भी....वो सब नही करता में