गुरुवार, 19 दिसंबर 2019

चाय से इश्क़ तक☕

चाय से इश्क़ तक 
हाँ कुछ ऐसी ही कुछ इश्क़ की कहानी है  ।


वो दिसम्बर का महीना था और ठंड जोरो पर थी और झीलों की नगरी उदयपुर में तो ठंड पूछो मत 
हम जैसे चाय के दीवानों के लिए चाय की टफरी जन्नत सी थी ।

हर रोज मै चाय की टफरी पर जाता और चाय लेके अपनी जगह पर बैठ ,चाय की चुस्किया लेता ।

मगर एक रोज....चाय की टफरी  पर लाल रंग का सलवार पहन वो आई थी ।
खुश्बू नाम था उसका और वो भी मेरी तरह चाय की दीवानी है ।

वो आई और बोली "भैया कड़क अदरक वाली चाय देना"

मै बस उसी को निहारे जा रहा था , उसके मासूमियत , उसके आंखों का तेज , उसकी मुस्कुराहट  और उसके माथे की बिंदी
मुझ पर कहर ठा रही थी और मानो मुझको इश्क़ के समंदर में डूबा रही थी ।

वो रोज चाय पीने आती और मै भी चाय पीने जाता
बस वही पर उसको देखने को मिल जाता और इस दिल को सकूँ मिल जाता ।

ऐसा शायद ही कोई दिन रहा हो कि उसके ख्वाब ना देखे हो 
बस उसी के लिए 1 घण्टे पहले चाय की टफरी पर जा बैठते और उनका इंतजार करते ।

खुश्बू नाम था ना उसका , जैसे ही आती माहौल खुशनुमा हो जाता मेरा उनकी एक झलक से।

हमे इश्क़ हो गया था उनसे और इश्क़ भी ऐसा की उनसे शादी के सपने आते हमको रात में 

पहली बार जिंदगी में ऐसा हुआ था कि आईने में खुद को सवारा हो हमने 
एकेले में आईने में देख उसको याद कर मुस्कुराते रहते हम ।

इश्क़ में खो गए थे उनके ।

मगर एक रोज हुआ यूं कि खुश्बू मैडम चाय पीने आई तब अपना पर्स घर भूल आई और पैसे थे नही उनके पास
 

मै झट से उठा और कहां मैडम आप ये पैसे रख लो 

पर मैडम मानी नही जिद्दी थी ना लेकिन थोड़े वक़्त बाद ....बड़ा कहने पर वो मान गयी और उसने कहाँ कल लौटा दूंगी आपके पैसे 

अगले दिन वो आई और मेरे साथ बैठी 
और बोली thank you कल के लिये और उसने मेरे पैसे लौटा दिए 

लेकिन इस छोटी सी पहल से मैने पहली बार उससे बात करी ,वो मेरे पास बैठी  ।

अगले दिन गलती से मैं पर्स भूल गया तो वो मैडम आई पास में और बोली आपके पैसे में दे देती हूं

मैंने कहां जी नही...लेकिन मैडम ने जबरदस्ती दे दिए । 

अगले दिन फिर से मैं उसके पास गया और उसके साथ बैठा और 2 चाय आर्डर की

मैंने खुश्बू मैडम को उसको पैसे लौटाए  और कहाँ thank you कल के लिए ।

उसमें मुस्कराकर कहा " मेरा नाम खुश्बू है " और आपका "
 मैंने कहा " जी रोहित 

उसने हाथ आगे बढ़ाते हुए कहाँ-  फ्रेंड्स ?
मैंने कहा जी बिल्कुल और मन ही मन सोचने लगा इसी दिन का तो इंतजार था हमे 

चाय आई और हम चाय पीते पीते बाते करने लगे ,बातों ही बातों में हम एक दुजे को जानने लगे

चाय की तरह हमारी दोस्ती का रंग भी गहरा और कड़क हो गया था 
हम एक दूजे को हर बात बताते , कैसे कब क्या हुआ मेरे साथ , कैसे बचपन मे पहली बार गिरा था
कैसे मुझे चोट लगी थी माथे पर , सब बातें एक दूजे को बताने लगे । 

हर शाम हम और 2 कप चाय के तैयार रहते मुलाकात को ।

धीरे धीरे जब वो मेरे काफी करीब आई तो 
एक दिन मैंने उसको सब बता दिया 
 " कैसे उसको देख मुझे पहली बार प्यार हुआ , बस उसी से शादी के ख्याल आते , कैसे सपनो में भी वोही नजर आती है
कैसे उससे मिलने के बाद बदल गया हूं मैं सब बता दिया  "
यूँ कहू की मैंने मेरे इश्क़ का इजहार कर दिया 
मगर वो  कुछ ना बोली   ।

थोड़ी देर बाद चुप्पी तोड़ वो बोली....आज के बाद चाय के 2 कप नही सिर्फ एक ही कप लाना

मैंने कहा ऐसा क्यों  "वो मुस्कुरा कर बोली आज से हम एक ही कप में चाय पीयेंगे प्यार और भी ज्यादा बढ़ता है इससे "

इतना कहकर उसने मुझको बाहों में भर लिया और कहाँ  
ये चाय से इश्क़ तक का सफर  अच्छा है 
जनाब , क्यो न इसे सातफेरो तक ले जाया जाए ।।

इस तरह चाय से शुरू होकर इश्क़ का सफर हमारा सातफेरो की ओर चल पड़ा ।


सातफेरो के सफर के बाद  भी इश्क़ आज भी वैसा ही है जैसे पहली नजर में उसे देख हुआ था

""आज भी वोही हम दोनों है ,
वोही चाय का एक कप 
और वोही बेसुमार इश्क़ है ।।""












( नोट:-कहानी के किरदार सभी काल्पनिक  है 
धन्यवाद )

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