शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

शायद औऱ सिर्फ शायद

जी कुछ अप्रैल का महीना था और रात बड़ी हसीं सी थी
गर्मी थी थोड़ी बहुत मग़र  उसके जितना गर्म कोई ना

रात के 9.30 बजे थे उस वक़्त जब वो मेरे कमरे में आई थी
हाथ मे उसके टिप्पिन था ।

दोनों ने साथ मे खाना खाया ...कभी वो मुझको तो कभी मै उसको निवाला खिला रहे थे

खाना हुआ और अब थोड़ी बाते शुरु हुई

एक दूजे के बारे में ,कैसे मुझे उसके बिना सब खाली सा लगता है
आखिर क्यों उसे जबतक दिन में 4-5 बार कॉल ना करु तो कुछ अच्छा नही लगता

उसके बच्चो जैसी हरकते मुझे कितनी पसन्द है

ये सब एक दूजे से बाते हो रही थी ।

तभी उसने कुछ रोमांटिक सा गाना लगाया और मौसम हसीं कर दिया
उसके दिल मे शायद महोब्बत की आग सी जल रही थी

वो मेरे करीब आई और मेरे होठो को उसके होठो से लगा दिया

मेरे लिए कुछ ऐसा एहसास था कि मै बया नही कर सकता

धीरे धीरे महोब्बत में हमने हदे पार की
औऱ जिस्म को बेपर्दा कर दिया

वो मुझसे जैसे कोई नागिन हो , लिपट सी गई

मग़र मैंने खुद पर काबू किया , महोब्बत में सही गलत को सोचा
औऱ सब कुछ एक दूजे को बाहों में भरने तक ही रखा
मैंने हद पार नही करी ।

फिर कुछ दिन हुए और उसे रोज नए बहाने ढूढ़ने पड़ रहे थे मुझे छोड़ देने को

औऱ एक दिन कुछ झूठी बात जबरन मुझपर थोप वो चली गयी ।

बहुत सोचा समझा ...मग़र क्या ख़ता थी मेरी कुछ पता नही चला ।

शायद उसे महोब्बत करने वाले पसन्द नही थे
शायद उसे जिस्मो को नोच खाने वाले लोग पसन्द थे

शायद उसे...मुझसे महोब्बत थी ही नही या शायद थी भी तो बस बिस्तर तक

या शायद ....उसे कोई और पसन्द था
या शायद उसे किसी का होना गवारा नही था

शायद ...शायद औऱ सिर्फ शायद ।

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